मल-मूत्र की कोठरी — राजा परीक्षित की प्रेरक कथा


राजा परीक्षित के जीवन का अंतिम दिन निकट था। उन्हें ज्ञात हो चुका था कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है। यद्यपि वे महान राजा थे, फिर भी मृत्यु का भय और शरीर छोड़ने का दुःख उनके मन से समाप्त नहीं हो रहा था।
तब परम ज्ञानी शुकदेव ने उन्हें एक कथा सुनाई।
एक बार एक राजा शिकार खेलने जंगल गया। शिकार का पीछा करते-करते वह रास्ता भटक गया। रात होने लगी और चारों ओर घना अंधकार छा गया। तभी उसे एक छोटी-सी झोपड़ी दिखाई दी। उस झोपड़ी में एक बीमार बहेलिया रहता था।
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233" crossorigin="anonymous"> झोपड़ी अत्यंत गंदी थी। एक कोने में मल-मूत्र त्यागने का स्थान था और छत पर शिकार किए गए जानवरों का मांस लटक रहा था। चारों ओर दुर्गंध फैली हुई थी।
राजा ने बहेलिए से कहा, “रात बहुत हो गई है। कृपया मुझे आज रात अपनी झोपड़ी में ठहरने दें। सुबह होते ही मैं चला जाऊँगा।”
बहेलिया बोला, “मैं पहले भी कई यात्रियों को यहाँ ठहराता रहा हूँ। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सुबह होने पर वे इस झोपड़ी को छोड़ना नहीं चाहते। इसलिए अब मैं किसी को नहीं ठहराता।”
राजा ने वचन दिया, “मैं ऐसा नहीं करूँगा। केवल एक रात रुकूँगा और सुबह चला जाऊँगा।”
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233" crossorigin="anonymous"> बहेलिया मान गया।
लेकिन हुआ कुछ और ही। पूरी रात उस वातावरण में रहने के बाद सुबह तक राजा उस गंदी झोपड़ी का अभ्यस्त हो गया। अब उसे वह स्थान बुरा नहीं लग रहा था। उलटे वह वहीं रहने की इच्छा करने लगा। जब बहेलिए ने उसे जाने के लिए कहा तो राजा उससे झगड़ने लगा।
कथा समाप्त कर शुकदेव जी ने राजा परीक्षित से पूछा, “बताओ, क्या उस राजा का व्यवहार उचित था?”
राजा परीक्षित ने तुरंत उत्तर दिया, “नहीं! वह तो बहुत बड़ा मूर्ख था। जिसने अपना राजमहल, अपना कर्तव्य और अपना दिया हुआ वचन सब भूलकर एक गंदी झोपड़ी में रहने का मोह कर लिया।”
तब शुकदेव जी मुस्कराए और बोले—
“राजन! वह राजा कोई और नहीं, आप ही हैं। यह शरीर भी उसी मल-मूत्र की कोठरी के समान है। आत्मा का इसमें जितने समय तक निवास आवश्यक था, वह समय अब पूरा हो चुका है। अब आत्मा को अपने अगले मार्ग पर आगे बढ़ना है। फिर इस नश्वर शरीर के लिए शोक और भय क्यों?”
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233" crossorigin="anonymous"> यह सुनकर राजा परीक्षित का मोह टूट गया। मृत्यु का भय समाप्त हो गया। उन्होंने शेष समय पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता से श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण किया और भगवान के स्मरण में लीन हो गए।
शिक्षा
यह शरीर नश्वर है, आत्मा शाश्वत है।
मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक यात्रा का अगला चरण है।
शरीर के मोह में पड़कर आत्मा के वास्तविक लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए।
जीवन का प्रत्येक क्षण ईश्वर-स्मरण और सद्कर्मों में लगाना चाहिए।
जय श्री राधे कृष्ण। 🙏🌹

Post a Comment

0 Comments