एक बार देवर्षि नारद मुनि स्वर्ग से पृथ्वी लोक की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि धरती पर रहने वाले लोग तरह-तरह के कर्म कर रहे हैं—कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे। कई लोग पाप करते हुए भी सुख भोग रहे थे, जबकि कुछ अच्छे लोग कठिनाइयों में जीवन जी रहे थे।
यह देखकर नारद जी के मन में एक गहरा प्रश्न उठ खड़ा हुआ—
"क्या भक्ति और अच्छे कर्म से कोई व्यक्ति अपने पुराने पापों के दंड से बच सकता है?"
अपने इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए वे तुरंत ब्रह्मलोक पहुँचे और सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के चरणों में प्रणाम किया।
नारद जी ने विनम्रता से पूछा—
“हे ब्रह्मा जी! यदि कोई मनुष्य पहले बुरे कर्म करता रहा हो, लेकिन बाद में वह सच्चे मन से भक्ति और अच्छे कर्म करने लगे, तो क्या वह अपने पापों से मुक्त हो सकता है? क्या वह पापों के दंड से बच सकता है?”
ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले—
“हे नारद! यह संसार कर्मों के नियम पर चलता है। जो जैसा कर्म करता है, वैसा फल उसे अवश्य मिलता है। यह नियम अटल है।”
नारद जी ने फिर पूछा—
“तो क्या भक्ति करने से भी दंड नहीं टल सकता?”
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ब्रह्मा जी ने समझाते हुए कहा—
“देखो नारद, पाप का फल तो भोगना ही पड़ता है, लेकिन सच्ची भक्ति और अच्छे कर्म उस दंड को कम कर सकते हैं। जैसे आग में हाथ डालने पर जलन तो होगी ही, लेकिन यदि पहले से सावधानी हो, तो नुकसान कम हो सकता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से पश्चाताप करता है, अपने बुरे कर्मों को छोड़ देता है और भगवान की भक्ति में लग जाता है, तो उसका मन शुद्ध हो जाता है। इससे उसके कर्मों का प्रभाव बदल जाता है। दंड समाप्त नहीं होता, लेकिन उसका कष्ट कम हो सकता है और आत्मा को शांति मिलती है।”
नारद जी ने फिर पूछा—
“तो क्या भक्ति व्यर्थ नहीं जाती?”
ब्रह्मा जी बोले—
“भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भक्ति इंसान को सही रास्ते पर लाती है, उसके भविष्य के कर्म सुधारती है और उसे मोक्ष की ओर ले जाती है। लेकिन यह सोचना कि केवल भक्ति करके पुराने पापों से पूरी तरह बचा जा सकता है—यह सही नहीं है।”
नारद जी को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। उन्होंने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर वापस लौट गए।
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सीख:
भक्ति और अच्छे कर्म जीवन को सुधारते हैं, लेकिन कर्मों का फल अवश्य मिलता है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए और सच्चे मन से भगवान की भक्ति करनी चाहिए।
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