एक नगर में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था। उसके पास धन-दौलत, बंगले, नौकर-चाकर और हर प्रकार की सुख-सुविधा थी। फिर भी उसके मन को शांति नहीं मिलती थी। दिन-रात वह किसी न किसी चिंता में डूबा रहता और भीतर से खालीपन महसूस करता था।
एक दिन नगर में एक प्रसिद्ध संत का आगमन हुआ। हजारों लोग उनका प्रवचन सुनने पहुंचे। सेठ भी वहां गया। संत ने अपने प्रवचन में कहा—
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous">
"सच्ची शांति धन, वैभव और भोग-विलास में नहीं, बल्कि परमात्मा की प्राप्ति में है। जो ईश्वर को पा लेता है, उसे जीवन की वास्तविक शांति मिल जाती है।"
संत की बातें सेठ के हृदय में उतर गईं। उसने निश्चय कर लिया कि वह परमात्मा को खोजकर ही रहेगा।
अगले ही दिन वह अपना घर-बार छोड़कर ईश्वर की तलाश में निकल पड़ा। वह एक शहर से दूसरे शहर, एक मंदिर से दूसरे मंदिर और एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ भटकता रहा। जहां किसी ने कहा कि यहां ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं, वह तुरंत वहां पहुंच जाता।
सालों बीत गए।
इस बीच उसका व्यापार चौपट हो गया। धन समाप्त होने लगा। शरीर भी कमजोर पड़ गया। लेकिन परमात्मा को पाने की उसकी इच्छा कम नहीं हुई। वह लगातार भटकता रहा, पर उसे कहीं भी ईश्वर के दर्शन नहीं हुए।
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous">
एक दिन वह एक नए नगर में पहुंचा। वहां लोगों से पता चला कि एक महान संत का प्रवचन चल रहा है। वह भी प्रवचन सुनने पहुंच गया।
जैसे ही संत बोलने लगे, सेठ को उनकी आवाज कुछ जानी-पहचानी लगी। वह आगे बढ़ा और ध्यान से देखा। आश्चर्य! ये तो वही संत थे, जिनके प्रवचन को सुनकर उसने वर्षों पहले अपना घर छोड़ा था।
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous">
सेठ तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा।
संत ने पूछा, "वत्स, तुम क्यों रो रहे हो?"
सेठ बोला, "गुरुदेव! आपके कहने पर मैं ईश्वर की खोज में निकल पड़ा था। वर्षों से जंगलों, पर्वतों, मंदिरों और तीर्थों में भटक रहा हूं। मैंने सब कुछ खो दिया, लेकिन आज तक मुझे ईश्वर नहीं मिले।"
संत मुस्कुराए और बोले—
"वत्स! तुमने मेरी आधी बात सुनी थी। मैंने कहा था कि ईश्वर को खोजो, लेकिन यह भी कहा था कि ईश्वर बाहर नहीं, तुम्हारे अपने भीतर है। उसे पाने के लिए दूर-दूर भटकने की आवश्यकता नहीं है। अपने घर लौटो, अपने कर्तव्यों का पालन करो, अच्छे कर्म करो, लोगों की सेवा करो और अपने मन को पवित्र बनाओ। जब मन निर्मल होगा, तब तुम्हें अपने भीतर ही परमात्मा के दर्शन होंगे।"
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous">
सेठ को अपनी भूल समझ में आ गई। वह घर लौट आया। उसने ईमानदारी से अपना काम किया, जरूरतमंदों की सहायता की और सदैव अच्छे कर्म करने लगा।
धीरे-धीरे उसके मन की अशांति समाप्त हो गई। उसके भीतर एक अद्भुत शांति का अनुभव होने लगा। तब उसे समझ आया कि परमात्मा बाहर नहीं, बल्कि हर मनुष्य के भीतर निवास करता है।
कहानी की सीख
ईश्वर की खोज बाहर नहीं, अपने भीतर करनी चाहिए। अच्छे कर्म, सेवा, प्रेम और निर्मल मन ही परमात्मा तक पहुंचने का सच्चा मार्ग हैं। 🙏✨
0 Comments